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70 Years of Indian Years of Indian
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करके उत्हें का्य्श का सिरूप िेकर उसके प्वत हम अपने आपको समवप्शत करते हैं।” संविधान ्ें ह्को कई अवधकार वदए हैं तो
इससे ्यह प्तीत होता है वक राजकी्य सतिा का प्धान स्ोत भारत की जनता है।
भारत साि्शभौम, प्जासतिाक, िोकराही, समाजिािी, वबनसांप्िाव्यक राषट् है। साि्शभौम ह्ारे वलए कुछ कत्जवयों का स्थि्जन भी वकया
सिवोच्च सतिा का सूचक है। अब भारत पर भारतिावस्यों का रासन है। भारत की भूवम पर, है। ह्ें इनका ्पालन करना चावहए।
आकार पर और तटितशी वनकट के समुद् पर उसका अबावधत अवधकार है। साि्शभौमति
एक ही और अविभाज्य है, वकसी राज्य को इससे अिग होने का अवधकार नहीं है। सरतंत्रता- िाणी, विचार, िेखन की सितंत्रता, व्यिसा्य, वनिास और आवजविका
िोकराही को हमने रासन प्णािी रूप में अपना्या है। ्यहां विधानसभा और संसि में कमाने की सितंत्रता, व्यन््त सिातंत्र्, सभा सिातंत्र् जैसी कई सितंत्रताएं जनता को
जनता के चुने हुए प्वतवनवध्यों में से ही मंवत्रमंडि बनता है और मुख्यमंत्री और प्धानमंत्री प्िान की गई हैं।
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चुने जाते हैं और िे ही िर चिाते हैं। बशक्ण का अबधकार – 6 साि से 14 साि तक के बच्चों के विए मुफत वरक्ण की
प्जासतिाक राषट् में प्जा ही सिवोपरर है। ्यहां विरेषावधकार वकसी को नहीं है। सुविधा की गई है। वरक्ण क्त्र में सबको समान अवधकार वि्या ग्या है।
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िर के तमाम का्या्शि्य सब के विए खुिे हैं। ्यहां िरांनुगत रासन का कोई सथान नहीं शोषण के बररुद्ध अबधकार – फजशीआत मजिूरी, मानि व्यापार, बच्चों और औरतों के
है। एक वन्यत सम्य के विए जनता रासकों को पसंि करती है। भारत के नागररक भारत व्यापार के विए कड़ी से कड़ी सजा त्य की गई हैं। अब कोई वकसी का रोषण, रारीररक,
में कहीं भी रह सकते हैं और आवजविका कमा सकते हैं। समाजिाि की कोई व्याख्या मानवसक ्या आवथ्शक तौर पर नहीं कर सकता।
संविधान में नहीं की है, ््योंवक हमारा राषट् कोई विरेष राजनैवतक विचाराधारा ्या िाि धाबमवाक अबधकार – अपने धम्श का अनुसरण करना हर एक का अवधकार है। सांसकृवत
से मु्त है। और रक्वणक अवधकार- िघुवमताओं को अपनी भाषा, ग्थों और संसकृवत को सुरवक्त
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समाजराद का सुबिता्वा - हर प्कार से सामावजक, आवथ्शक ्या राजनैवतक रोषण से रखने का अवधकार वि्या ग्या है।
मु्त, सबके विए त््या्य और समान तक सुरवक्त करने िािी विचारधारा... बस इतना िघारणरीय उ्पयोग का अबधकार – मूिभूत अवधकारों के रक्क के विए हमारे
ही होता है। संविधान में बहुत सी सुविधाएं हैं। जावहर वहत की एन््िकेरन की एक प्वसद्ध व्यिसथा
बिनसांप्रदाबयकता – राषट् की सिीकृत विचारधारा से सवहषणुता, मानिता, धावम्शकता, ्यह है वक एक सामात््य नागररक भी जहां जावहर वहत की समस्या हो, िहां उसके प्वत
नैवतकता जैसे सिाचारों के प्वत आिर प्िवर्शत होता है। राषट् ने धम्श को जनता का अंत्रत त््या्याि्य का ध्यान केंवद्त कर सकता है। हमारे संविधान में जनता को अवधकार विए
व्यिहार माना है, इससे उसका कोई सरोकार नहीं है। वसफ्फ इतना जरूरी बनता है वक गए हैं और साथ में थोड़ा फज्श का समथ्शन भी वक्या ग्या है। ्यह जापान की िेन है, ्यह
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नागररक की कोई भी प्िवति राषट्वहत के वखिाफ नहीं होनी चावहए। प्रणा हमने जापान से पाई है।
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हमारे संविधान ने जनता को कई अवधकार विए हैं और साथ में फज्श का भी समथ्शन फजवा – अपने राषट् के संविधान को, राषट् धिज को, राषट्गीत को सममान िेना, आिर
वक्या है। सबसे पहिा अवधकार है समानता का, का्यिे के सामने सब समान हैं। धम्श, करना। वजन आिरगों से प्रणा पाकर हमारे िरिावस्यों ने संघष्श वक्या उन आिरगों को
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जावत, िग्श के अनुसार भेिभाि पर प्वतबंध है। जावहर रोजगारी में सब को समानता है। सुरवक्त रखना। अपने राषट् की सेिा के विए, सुरक्ा के विए अपने आपको समवप्शत कर
असपृशता और वखताबों का अब कोई सथान नहीं है। िेना ््योंवक जननी जत्मभूवम सिग्श से महान है।
श्री शहािुद्रीन राठौड़ पद्मश्री से सममाहनत हैं। पेशे से हशक्षक श्री राठौड वयंगय व हासय लेखन के क्षेत् में भारत का जाना पहचाना नाम हैं।
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